देहरादून(ब्यूरो) देवभूमि के नाम से प्रसिद्ध उत्तराखंड की सामाजिक और आर्थिक संरचना की रीढ़ यहां की महिलाएं हैं। पहाड़ी भूगोल की चुनौतियों के बीच नारी शक्ति के संघर्ष और योगदान को पहचानते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने महिला सशक्तिकरण को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बनाया है। राज्य में बेटियों के जन्म से लेकर उनकी शिक्षा, स्वरोजगार और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई महत्वाकांक्षी योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनका उद्देश्य “मातृशक्ति” को आर्थिक और मानसिक रूप से सशक्त बनाना है।
शिक्षा और स्वास्थ्य: सशक्त भविष्य की नींव
धामी सरकार की फ्लैगशिप योजनाओं में से एक ‘नंदा गौरा योजना’ बालिका लिंगानुपात में सुधार और शिक्षा को बढ़ावा देने में गेमचेंजर साबित हुई है। इसके तहत पात्र परिवारों की बेटियों को जन्म के समय और 12वीं पास करने पर विभिन्न किस्तों में कुल 62,000 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाती है, ताकि उनकी पढ़ाई में पैसे की बाधा न आए। वहीं, गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य व पोषण को सुनिश्चित करने के लिए ‘मुख्यमंत्री महालक्ष्मी किट योजना’ और ‘ईजा-बोई शगुन योजना’ चलाई जा रही है, जिससे संस्थागत प्रसव को बढ़ावा मिला है।
महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाने के लिए राज्य सरकार ने स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के माध्यम से एक आंदोलन शुरू किया है। ‘लखपति दीदी योजना’ के तहत ग्रामीण महिलाओं को तकनीकी प्रशिक्षण, लोन और उनके स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग (जैसे ‘हाउस ऑफ हिमालयाज’ ब्रांड) के लिए मदद दी जा रही है। इसका परिणाम यह है कि प्रदेश की 2.65 लाख से अधिक महिलाओं की सालाना आय 1 लाख रुपये से अधिक हो चुकी है।
इसके अलावा, विधवा, तलाकशुदा या परित्यक्ता महिलाओं को सम्मानजनक आजीविका देने के लिए ‘मुख्यमंत्री एकल महिला स्वरोजगार योजना’ के तहत खुद का छोटा उद्योग शुरू करने के लिए 1 लाख रुपये तक का गैर-वापसी अनुदान दिया जा रहा है। महिला समूहों के लघु उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए 5 लाख रुपये तक का ब्याज रहित लोन भी उपलब्ध कराया जा रहा है।