11वें देहरादून इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में छाई रही डॉक्युमेंट्री आदि कैलाश।

देहरादून ब्यूरो

हरीश शर्मा के निर्देशन में बनी फिल्म ने जीता सम्मान, अभिनेता हेमन्त पाण्डेय बोले—“पिथौरागढ़ और उत्तराखंड को हमारा यह योगदान”

देहरादून। आस्था, हिमालय और उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को पर्दे पर उतारने वाली निर्देशक हरीश शर्मा की डॉक्यूमेंट्री ‘आदि कैलाश –

A Forgotten Path to the Divine’ ने 11वें देहरादून इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री का पुरस्कार हासिल किया है।

फेस्टिवल में डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग के बाद दर्शकों और फिल्म से जुड़े लोगों के बीच आदि कैलाश की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और मानवीय यात्रा को लेकर विशेष चर्चा हुई। फिल्म में केवल आदि कैलाश की धार्मिक महत्ता ही नहीं, बल्कि सीमांत हिमालयी क्षेत्र के लोगों, उनकी संस्कृति, प्रकृति और बदलते परिवेश को भी सामने लाने की कोशिश की गई है।

स्क्रीनिंग के बाद फेस्टिवल क्यूरेटर शांतनु गांगुली ने डॉक्यूमेंट्री के एंकर और जाने-माने अभिनेता हेमन्त पाण्डेय से पूछा कि वह ‘आदि कैलाश’ को किस रूप में देखते हैं। हेमन्त पाण्डेय ने बेहद संक्षिप्त लेकिन भावपूर्ण जवाब दिया—

“पिथौरागढ़ और उत्तराखंड को हमारा यह योगदान है।”
“पिथौरागढ़ का कर्ज कभी नहीं चुका सकता” — हरीश शर्मा

इस अवसर पर निर्देशक हरीश शर्मा ने फिल्म के साथ अपने व्यक्तिगत और भावनात्मक रिश्ते को साझा किया। उन्होंने कहा कि पिथौरागढ़ उनके लिए महज एक लोकेशन या डॉक्यूमेंट्री का विषय नहीं है, बल्कि उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

उन्होंने कहा—
“मैं पिथौरागढ़ में पांच साल रहा हूं। उस धरती ने मुझे जो दिया, उसका कर्ज मैं कभी नहीं चुका सकता। ‘आदि कैलाश’ और ‘ब्राज़ील इन बनारस’ मेरी छोटी-सी कोशिश हैं कि पिथौरागढ़ के प्रति अपनी जिम्मेदारी का कुछ हिस्सा निभा सकूं।”

हरीश शर्मा के लिए यह जुड़ाव इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय पिथौरागढ़ में बिताया। पत्रकारिता के दौर में भी उनका इस क्षेत्र और यहां के लोगों से गहरा रिश्ता रहा। यही आत्मीयता उनकी दोनों डॉक्यूमेंट्री में अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है।

एक फिल्म आस्था की, दूसरी फुटबॉल के जुनून की
दिलचस्प बात यह है कि हरीश शर्मा की ‘आदि कैलाश’ और ‘ब्राज़ील इन बनारस: द भैरब दत्त स्टोरी’ दोनों की जड़ें पिथौरागढ़ से जुड़ती हैं, लेकिन दोनों की दुनिया बिल्कुल अलग है।

‘आदि कैलाश’ हिमालय की आध्यात्मिक यात्रा है, जबकि ‘ब्राज़ील इन बनारस’ पिथौरागढ़ से निकले फुटबॉलर और कोच भैरब दत्त के जीवन, संघर्ष और फुटबॉल के प्रति उनके समर्पण की कहानी है।

भैरब दत्त ने बनारस में फुटबॉल को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और खिलाड़ियों को तैयार करने में अपना जीवन लगाया।

डॉ. ललित पंत की पुस्तक से प्रेरित है ‘आदि कैलाश’
‘आदि कैलाश’ की परिकल्पना डॉ. ललित पंत की पुस्तक ‘अजपथों से हिमशिखरों तक’ से प्रेरित है। फिल्म हिमालय के दुर्गम रास्तों से गुजरते हुए आदि कैलाश की आध्यात्मिक महत्ता के साथ उस भूगोल और समाज को सामने लाती है, जो लंबे समय तक मुख्यधारा के सिनेमा और पर्यटन की नजरों से अपेक्षाकृत दूर रहा।

डॉक्यूमेंट्री में अभिनेता हेमन्त पाण्डेय एंकर के रूप में दर्शकों को इस यात्रा से जोड़ते हैं। फिल्म के निर्माता संदीप झा और हरीश शर्मा, सिनेमैटोग्राफर मनिका सिसोदिया तथा एडिटर इरशाद दिल्लीवाला हैं।

पिथौरागढ़ से फिल्म फेस्टिवल तक

सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री का पुरस्कार मिलने के बाद ‘आदि कैलाश’ की यात्रा में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि जुड़ गई है। निर्देशक हरीश शर्मा के मुताबिक इस सम्मान की सबसे बड़ी खुशी यही है कि पिथौरागढ़ की धरती, उसकी आध्यात्मिक विरासत और वहां के लोगों की कहानी एक बड़े सिनेमाई मंच तक पहुंच रही है।

‘आदि कैलाश’ का यह सम्मान केवल एक फिल्म की उपलब्धि नहीं, बल्कि उस हिमालयी भूभाग की कहानी को मिला मंच भी है, जिसे फिल्म की पूरी टीम ने कैमरे के जरिए दुनिया के सामने लाने की कोशिश की है।

 

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